बेंतिलादियों से सुबुक सब में हम हुए,
जितने जियादाह हो गए उतने ही कम हुए|
हस्ती हमारी अपनी फना पर दलील है,
यां तक मिटे के आप हम अपनी कसम हुए|
- मिर्जा गालिब
Tuesday, May 19, 2009
Monday, March 23, 2009
लहजा बदल के ...
अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं,
फ़राज़ अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं.
राह-ऐ-वफ़ा में हरीफ-ऐ-खिराम कोई तो हो,
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं,
ये कौन लोग है मौजूद तेरी महफिल में,
जो लालचों से तुझ,मुझको जल के देखते हैं.
ना तुझको मात है ना मुझको मात है,
तो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं.
अभी तलक तो कुंदन हुए ना राख हुए,
हम अपनी आग मैं हर रोज़ जल के देखते हैं.
बहुत दिनों से नहीं है उसकी खैर खबर,
चलो फ़राज़ को ऐ यार चल के देखते हैं.
-अहमद फराज़
फ़राज़ अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं.
राह-ऐ-वफ़ा में हरीफ-ऐ-खिराम कोई तो हो,
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं,
ये कौन लोग है मौजूद तेरी महफिल में,
जो लालचों से तुझ,मुझको जल के देखते हैं.
ना तुझको मात है ना मुझको मात है,
तो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं.
अभी तलक तो कुंदन हुए ना राख हुए,
हम अपनी आग मैं हर रोज़ जल के देखते हैं.
बहुत दिनों से नहीं है उसकी खैर खबर,
चलो फ़राज़ को ऐ यार चल के देखते हैं.
-अहमद फराज़
Monday, September 8, 2008
Friday, May 9, 2008
क्या कहना ?
मुझे इश्तहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियां,
जो कहा नही वो सुना करो, जो सुना नही वो कहा करो
Friday, September 14, 2007
Wednesday, September 12, 2007
मन ही तो है ...
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः
बन्धनं विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं मनः ।
- त्रिपुरातपिनि उपनिषद (त्रिपुरातापिन्युपनिषत्)
http://www.sanskritdocuments.org/all_sa/trip-tapi_sa.html
बन्धनं विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं मनः ।
- त्रिपुरातपिनि उपनिषद (त्रिपुरातापिन्युपनिषत्)
http://www.sanskritdocuments.org/all_sa/trip-tapi_sa.html
Subscribe to:
Posts (Atom)
